जिस मंदिर में लोग अपनी मेहनत की कमाई भगवान के चरणों में चढ़ाते हों, उसी मंदिर के दान के पैसे से नेताओं, VIP मेहमानों और रसूखदार लोगों की खातिरदारी होने लगे — तो सवाल उठेंगे ही. और अब यही सवाल पूरे देश में गूंज रहा है. मामला है बाबा केदारनाथ धाम का.
पूरा विवाद शुरू हुआ एक RTI से. उत्तराखंड के RTI एक्टिविस्ट और वकील विकेश नेगी ने बद्री-केदार मंदिर समिति यानी BKTC से पिछले साल के खर्चों की जानकारी मांगी. जो दस्तावेज सामने आए, उन्होंने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी.
सबसे बड़ा नाम सामने आया नेहा जोशी का. ये उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी की बेटी हैं. RTI दस्तावेजों के मुताबिक, उनके दो दिन के केदारनाथ दौरे पर करीब 40 हजार रुपए खर्च दिखाए गए. केदारनाथ विधायक आशा नौटियाल का नाम भी दस्तावेजों में सामने आया — उनके नाम पर 37 हजार 500 रुपए खर्च दिखाया गया. इसके अलावा RSS संघ प्रचारक के नाम पर 22 हजार 500 रुपए खर्च दर्ज है.
RTI एक्टिविस्ट विकेश नेगी का आरोप है कि सिर्फ कमरे और खाने का खर्च नहीं, बल्कि हेलीकॉप्टर टिकट तक मंदिर के पैसे से बुक किए गए.
एक आम श्रद्धालु केदारनाथ जाने से पहले महीनों प्लानिंग करता है. हेलीकॉप्टर की टिकट महंगी. होटल महंगे. रास्ते मुश्किल. लेकिन यहां सवाल उठ रहा है कि क्या नेताओं और रसूखदार लोगों के लिए मंदिर समिति खुद इंतजाम कर रही थी.
बवाल बढ़ा तो BKTC चेयरमैन हेमंत द्विवेदी को जांच बैठानी पड़ी. चार सदस्यीय जांच समिति बनाई गई और 20 दिन में रिपोर्ट देने को कहा गया. नेहा जोशी ने आरोपों को झूठ बताया और कहा कि उनके पास कैश पेमेंट का सबूत है. आशा नौटियाल ने भी कहा कि उन्होंने कभी VIP सुविधा नहीं मांगी.
लेकिन फिर वही सवाल — अगर नेताओं ने खुद भुगतान किया था तो मंदिर समिति के रिकॉर्ड में उनके नाम पर खर्च क्यों दिखा? अगर रिकॉर्ड सही हैं तो फिर सफाई क्यों दी जा रही है? कोई तो एक झूठ कह रहा है.
लोग दान इसलिए करते हैं कि मंदिर की व्यवस्था बेहतर हो, यात्रियों को सुविधा मिले, धर्मशालाएं सुधरें. लेकिन अगर वही पैसा नेताओं के खाने, कमरों और हेलीकॉप्टर पर खर्च हो रहा हो, तो जनता क्यों नहीं भड़केगी? भगवान के दरबार में बराबरी होनी चाहिए — भक्तों का पैसा भक्तों की सुविधा पर लगना चाहिए.
